Modi, Yoga & Pseudoscience

“To err is human; to forgive divine!”

But, can Prime Minister Narendra Modi be pardoned for a monumental mistake he has made because of which every Indian, regardless of his caste, creed, colour, sex or status is likely to pay heavily. It is a blunder, the ill effects of which will start manifesting sooner than later.

Shri Narendra Modi tried (mind the stress on the word, “tried”) to popularise Yoga in India. People gathered in large numbers and did it, at least once a year on a day reserved for the activity. Some did it to be seen on the TV screen; some to get the free Tee shirts and the Yoga mats––each had a reason, to do Yoga on the occasion. Lure of a day off from the office to be a part of the annually organised Yoga camp also motivated the office goers. Then there were secular people who thought that it was an effort to saffronise the Indian population. There were others who thought Surya Namaskar was a Hindu ritual. Of course, there was a small chunk of the population that took Modi and Yoga seriously.

With his conviction Modi found a definitely bigger market for Yoga in the West. People in the US and Europe took to Yoga more seriously. China has also accepted Yoga in a big way. Even the Saudis have no qualms about doing the Surya Namaskar. ††

Yoga se Hoga

The UN even declared June 21 as the World Yoga Day. Credit must go to Shri Modi for popularising Yoga all over the world. And that’s where he has faltered.

It is simple science. When we breathe we take in air and consume the oxygen contained in the air. Almost all of Yogic exercises are based on modulating breathing. When people do Yoga they take in more air (read “oxygen”). Their organs, the brain in particular benefits from the excess oxygen it gets. Now how does that matter?

Elementary!

Like water on this planet, oxygen in the atmosphere is limited. If some people take in more of it, those who don’t do Yoga would be (naturally) deprived of their legitimate share of the life giving substance. In fact, by the time they would get out of their beds in the morning, probably the Yogis would have consumed most of the oxygen. Such people (who don’t do Yoga) would suffer from Hypoxia (relative lack of oxygen) and respiratory diseases. Air pollution will make their condition worse.

Survival of the Yoga Practitioner

I don’t want to paint a doomsday scenario. Suffice it to say that, looking at the trend, the US, Europe, Saudi Arabia, China and some other countries will take away most of the atmospheric oxygen; other countries, including India will be deprived of the same. Wars over oxygen can’t be ruled out. There is only one consolation that people in Pakistan have not accepted Yoga. Needless to say a people less inclined to doing Yoga will tend to suffer unless treaties are signed to limit the number of people in each country doing Yoga. I don’t see that happening any time soon. Thus popularising Yoga around the world before ensuring its popularity in India has been a monumental mistake.

Sometime in the future each man will have to fight for his share of oxygen. Only the fittest will survive. There is little choice but to embrace Yoga. I have done it.

[This article is inspired by the same science, which teaches us that river water that is used to generate electricity is rendered useless for irrigation.]   

बड़ी सोच!?

सुबह से करीम बारह कारें साफ कर चुका था। यह तेहरवीं गाड़ी थी। हाथ में कपडा लिए, वह डर-डर कर उस चमचमाती लाल फेरारी कार की तरफ बढ़ा और फिर ठिठका और रुक ही गया। वह नोएडा सेक्टर-18 के रेडिसन ब्लू होटल के सामने पार्क की गयी गाड़ियों पर कपड़ा मार कर दो पैसे कमा लेता था। प्रायः महंगी कारों की सफाई करने से ज्यादा पैसे मिल जाया करते थे। उसके मन में पनपते डर का एक कारण था। पिछले हफ्ते ही एक कार मालिक ने उसकी पिटाई कर दी थी। उसका का गुनाह था––कार के मालिक से बिना पूछे गाड़ी को हाथ लगाना। ग्यारह साल के करीम को दो चांटों के लगने से होने वाली शारीरिक पीड़ा का आभास तक नहीं हुआ था परन्तु अपने साथ हुई बदसलूकी से लगी चोट का दर्द वह भुला नहीं पाया था।

उसने उस फेरारी जितनी आलिशान कार पहले कभी नहीं देखी थी। चुम्बकीय आकर्षण था उस कार में; वह उस के नज़दीक जाकर उसे निहारने लगा। उसका लाल रंग, उसके बम्पर, उसके सामने की जाली, उसकी लाइटें, उसका डैशबोर्ड, उसकी साफ-सुथरी सीटें… एक दम नई थी वह कार। अभी तो उसकी सारी सीटों के पॉलिथीन के कवर भी नहीं उतरे थे और बोनट पर सिन्दूर से बना स्वस्तिक का निशान बिलकुल ताज़ा लग रहा था। स्टीयरिंग पर बंधी माता रानी की चमकवाली लाल चुन्नी, और साइलेंसर पर बंधा काले रंग के धागे का लच्छा कार के मालिक की देवी माता में आस्था को दर्शा रहा था। 

करीम अपने आप को रोक नहीं पाया था; ताका-झांकी कर रहा था। अपने चार दिन पुराने अनुभव को भूल सा गया था। तभी उसने लम्बे कदम भरते एक छः फुटे नौजवान को अपनी तरफ आते देखा। वह मोबाइल पर किसी से बात कर रहा था। करीम सहम सा गया। पल भर में उसे फिर से चार दिन पहले मर्सिडीज़ के मालिक से पड़े झापड़ याद आ गए।

“ओके अनु… तो फिर आज शाम हम गोल्डन ड्रैगन जा रहे हैं। मैं तुम्हें छः बजे घर से पिक अप करूंगा। वी विल गो फॉर अ लॉन्ग ड्राइव बिफोर डिनर,…  बाय बाय! लव यू।” कहते हुए युवक ने मोबाइल बंद किया और करीम पर प्रश्न भरी निगाहें डालीं। करीम ने कार को हाथ नहीं लगाया था फिर भी वह डर-सहम सा गया।

अगर नज़रें क़त्ल कर सकतीं तो युवक की नज़रों से करीम की मौत संभावित थी।

“स स स ररर, कार साफ कर दूँ?” करीम हाथ जोड़ कर मिमियाने लगा। “अच्छे से चमका दूंगा। यह देखिये, यहाँ पर धूल बैठ गयी है।”

युवक को सोचता हुआ देख कर करीम ने थोड़ा साहस जुटाया और आगे बोला, “सर, सिर्फ पाँच मिनट लूँगा।” छोटी सी उम्र में करीम ने यह जान लिया था की बड़े लोगों को अच्छा लगता है जब कोई उनके समय की कद्र करे। युवक को ऐसा लगा जैसे कि करीम ने उसे कुछ और फोन कॉल्स करने का मौका दे दिया हो। उसने सिर हिला कर करीम को कार साफ करने की अनुमति दे दी और फिर से मोबाइल पर एक नंबर डायल करने लगा।

“हैलो, मैं अमित कालरा बोल रहा हूँ… यस, यस, मैंने ही कॉल किया था।  जी हाँ, टेबल फॉर टू… कैंडल लाइट… ओके, कनफर्म्ड।”

अमित कालरा कॉल किये जा रहा था। उन कॉल्स के दौरान उसकी नज़र करीम पर टिकी थी।

करीम बड़ी तन्मयता से कार साफ कर रहा था। कपड़े से पोंछ कर वह अलग-अलग कोण से कार को देख कर तस्सली कर रहा था कि चमक में कहीं कमी न रह जाय। करीम की मेहनत से युवक प्रभावित था। करीम के फटे कपडे देख कर उसे बच्चे पर दया भी आने लगी थी। मन ही मन उसे अच्छी टिप देने का निश्चय कर लिया था अमित ने।

“हेलो भैया, व्हाट अ फैबुलस कार? इट रिएली फ्लाईज़… सुपर्ब… आई एम एंजोयिंग ड्राइविंग इट। तुसि ग्रेट हो। आई लव यू, बिग ब्रदर।” अमित ने एक और कॉल किया।

अमित कालरा आज खुश था। और क्यों न होता? उस के मन में अपनी नई फेरारी में पहली बार अनु को सैर कराने की उमंग जो थी। पर वह असमंजस में भी था, “यमुना एक्सप्रेसवे पर जाना ठीक होगा या डीएनडी पर सैर का आनंद आएगा? आज डिनर के वक्त हिम्मत कर के अनु को प्रोपोज़ कर ही दूंगा। उसे फूल कम पसंद हैं, डार्क चॉकलेट्स ठीक रहेगीं…।”

मई की गर्मी में भी अमित कालरा वसंत ऋतु में खिले फूलों की ताज़गी को महसूस कर रहा था।

न जाने कैसे पंद्रह मिनट बीत गए। मन में चल रहे अनेक संवादों में अमित कुछ इस तरह खो गया था कि समय का पता ही नहीं चला। जब विचारों के भंवर से अमित उबरा तो अपने सामने करीम को पाया। अमित उस गरीब की मुस्कुराहट के पीछे छुपी गम्भीरता को महसूस कर रहा था। अमित ने पर्स खोल कर करीम के हाथ में एक पांच सौ रुपये का नया नोट रख दिया।

निस्संदेह आज कुछ खास बात थी; अमित के मन में उदारता उमड़ रही थी। उम्मीद से बहुत अधिक पैसे पाकर करीम की ख़ुशी का कोई ठिकाना न रहा। उसका चेहरा अब एक खुली किताब था जिसे अमित आसानी से पढ़ सकता था। “सर, ये तो मेरे तीन दिन से ज्यादा की कमाई हो गयी,” करीम ख़ुशी से पगला सा गया ।

“क्या करोगे इन पैसों का,” अमित ने वैसे ही गाड़ी में बैठते हुए मुस्कुराते हुए पूछ लिया। करीम के उत्तर में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी।

“सर, सीधा घर जाऊँगा। अगले कुछ दिन गाड़ियाँ साफ नहीं करूंगा। पढाई करुँगा। अगले हफ्ते परीक्षा है। इन पैसों से घर का काम चल जाएगा।” करीम की बातें सुन कर अमित के मन में अचानक उत्सुकता और दया के भावों की छोटी सी सुनामी आ गयी।

“कहाँ रहते हो?”

“सर, पास ही में; सेक्टर-52 में जो फ्लाईओवर बन रहा है उसके पास की झुग्गिओं में मेरा घर है। अम्मी वहीँ साइट पर काम करती हैं।”

“कालरा कंस्ट्रक्शंस की साइट पर?”

“सर नाम तो नहीं मालूम पर हमारे मालिक ऐसी ही लाल गाड़ी में कभी-कभी आते हैं। ताड़ जैसे ऊँचे हैं, बिलकुल आप जैसे दिखते हैं।”

अमित कालरा के चेहरे पर मुस्कराहट का आना स्वाभाविक था––कालरा कंस्ट्रक्शंस उसके पिता की कंपनी थी जिसे उसका भाई सुमित चलाता था। अमित ने अभी-अभी एमिटी यूनिवर्सिटी से एम बी ए पास किया था। सी.जी.पी.ए.  बहुत कम था––डिग्री तो नाम के लिए चाहिए थी, आगे चल कर तो घर का बिज़नेस ही संभालना था। घर पर सभी बहुत खुश थे।

“आओ में तुम्हें वहाँ छोड़ दूँगा। मैं उधर ही जा रहा हूँ,” अमित के मन में उदारता और दया भाव ने एक और हिलकोरा लिया। उसने मुस्कुराते हुए करीम को कार में बैठने का इशारा किया। अमित सोच रहा था कि उस गरीब की जिंदगी का वह एक बड़ी यादगार वाला दिन होगा। अमित को ख़ुशी थी कि वह उस बच्चे को एक खास ख़ुशी देने जा रहा था। उसे, खुद को होने वाली अनुभूति में कहीं––थोड़ा सा सही––घमंड घुला हुआ था।

करीम सकपकाया। वह सपने में भी ऐसी कार में बैठने की बात नहीं सोच सकता था। वह कार के खुले दरवाजे की ओर बढ़ा और रुक गया। फिर जल्दी से उसने अपनी टूटी चप्पलें––जिनकी सेफ्टी पिन से मरम्मत की गयी थी––उतारी और उनको थपथपा कर उनकी धूल को निकलाकर उन्हें साफ किया। फिर जल्दी से जेब से एक गन्दा सा कपड़ा निकाला और उसे कार की पॉलिथीन से कवर की गयी सीट पर बिछा दिया––”सर, रुमाल फैला देता हूँ, सीट गन्दी नहीं होगी।”

करीम की ख़ुशी का ठिकाना न था।

करीम की ख़ुशी में अमित आनंदित हो रहा था। सेक्टर-18 के गुरूद्वारे के सामने से निकलते हुए अमित के मन में न जाने क्या बात आयी कि सीधे सेक्टर-52 की तरफ जाने के बजाय उसने जी.आई.पी. के सामने यू-टर्न ले लिया और फिल्म सिटी की ओर चल पड़ा। वह चाहता था कि करीम को थोड़ी लम्बी सैर कराए।

खुश लेकिन सहमा सा, करीम कभी कार में तो कभी बाहर देख रहा था। कार के स्टीरियो पर बजते गाने की आवाज़ कम करते हुए अमित ने बोलना शुरू किया, “कैसा लग रहा है?”

“बहुत अच्छा,” पुलकित करीम चहचहाया।  

“जानते हो, मुझे यह कार मेरे भाई ने मेरे बर्थडे पर गिफ्ट में दी है?”

“अच्छा!?” करीम की आँखों में प्रश्न और विस्मय से भरी प्रशंसा थी।

“वे तो मुझे रेंजरोवर देना चाहते थे पर मैं फेरारी के लिए अड़ गया,” अमित खिलखिलाया और फिर जोर देकर बोला, “… … सोच बड़ी होनी चाहिए।”

ये बातें करीम की समझ से बाहर थीं। फिर भी वह जवाब में आँखें बड़ी कर के सिर हिला रहा था।

“और घूमना है?”

“नहीं सर, बस अब मुझे उतार दें।”

“कोई बात नहीं, मैं तुम्हें साइट पर छोड़ दूँगा।”

महामाया फ्लाईओवर की ओर से एक लम्बा चक्कर लगाते हुए अमित ने कार को सेक्टर-52 की झुग्गिओं के सामने ला कर रोक दिया और करीम की और देख कर एक बार फिर मुस्कुराया, “परीक्षा के लिए बेस्ट ऑफ़ लक।”

“थैंक यू, सर,” करीम ने कार का दरवाज़ा खोलने की कोशिश करते हुए कहा। उससे दरवाजा न खुलते देख अमित ने मदद की। कार से उतरते-उतरते करीम रुक गया और अमित की ओर देख कर विनती की, “सर, प्लीज एक मिनट रुक जायें, मैं अभी लौट कर आता हूँ।”

करीम की मेहनत और लगन पर फिदा अमित ने हामीं भर दी और अपना मोबाइल उठा लिया और व्हाट्सएप मैसेजेस देखने लगा।

दो ही मिनट में करीम वापस आ गया। उसकी गोद में एक छोटा सा बच्चा था जिसे वह बड़ी मुश्किल से उठा पा रहा था। कार के पास आकर वह अमित से बोला, “सर, ये मेरा भाई आरिफ है।” फिर आरिफ को ऊँगली से दिखा कर बोला, “आरिफ, पता है, आज इन साब ने मुझे इस मोटर में बिठा कर घुमाया है। ये इनके बड़े भाई ने इनको तोहफे में दी है। एक दिन मैं भी तुझे ऐसी ही गाड़ी तोहफे में दूँगा।”

अमित ने एक मिनट बाद कार आगे बढ़ा दी। फिर देर तक कार के रियर व्यू मिरर में दोनों बच्चों को खिलखिला कर टा-टा करते देखता रहा।

“सोच बड़ी होनी चाहिए।” अमित की अपनी ही आवाज़ उसके कानो में गूँज रही थी।

Dear Mr Kejriwal, are you listening?

Dear Mr Kejriwal,

You began your journey of sweeping the muck in Indian Politics with baby steps alongside Anna Hazare. Soon you outpaced him; the old soldier could not march by your side. You left him behind. Nothing is wrong about that decision of yours because when a mission is still unaccomplished; it is not incorrect, unfair or unethical to leave behind the weak and the wounded. They can be attended to; their wounds nursed, and their contribution to the war effort can always be lauded after the flag has been hoisted on the objective. In some cases, a nicely worded epitaph can make up for everything.

The problem is of shifting goal posts and ever-changing objectives. Selection and Maintenance of Aim is a principle of war. It is difficult; nay impossible to recall a victory wherein this proven principle has been flouted. Needless to say, the journey is long and arduous; you have miles to go. Be sure what you want to aim at: purifying Indian politics or uplifting aam admi or uprooting BJP with the help of others with whom you otherwise don’t see eye to eye. 

I hear you have done remarkable job in some walks of Delhi’s life; your team’s effort to provide quality education and healthcare is, beyond any doubts, unparalleled; it deserves a very special mention and appreciation. May you have the resources, power and support to keep going great guns.

Now, how does one keep going when people are jumping off the bandwagon at regular intervals? Some members of your core team who have left you have compared you with Napoleon. Napoleon––not the French Emperor, but the Napoleon of George Orwell’s Animal Farm. And, Ms Shazia Ilmi thinks she was the Boxer (of the same epic). Others who left you also perhaps thought so, but didn’t say it openly. But, you don’t have to worry on that count. Animal Farm, written nearly three quarters of a century ago as a satire on communism fits Indian politics of today. It fits very well! Rejoice in the fact that you don’t stand alone––every party has Napoleons. When I look at you (people) dark humour amuses me to no end.

That’s just the preface to draw your attention; what follows is more serious. I only hope you have the time, and the inclination too, to read on.

What has struck my imagination recently is your decision to consider granting free travel to women in DTC buses and Delhi Metro. The reason you have extended this proposal is––women’s safety. It baffles me to no end. How can making the ride free for women in public transport enhance their safety? A large number of women can afford public transport and are already availing DTC and Delhi Metro services. The additional number of women who will get attracted to (government) public transport because of the freebie will be miniscule. And, if I am not grossly wrong, in these times of #MeToo, by this very gesture of yours, you might end up offending many a self-respecting woman who seek absolute equality in thoughts and actions.

If you still implement your plan, I fear that you will start a practice, which will nurture yet another breed of people getting used to free lunches with added burden on the state. Mind you Mr Kejriwal, the public are smart. Blame yourself for it; you made them smart. I remember you telling them long ago, to accept whatever freebies (and bribes) other parties were giving, and still vote for AAP. I will not be surprised if, in the next assembly elections women do just that––accept your freebie and still go by their choice.

Freebies

Think of it, there are umpteen ways of making women safer than by just giving them free rides. Directing the resources and energies towards, and focussing them on the source of crime can make people, let alone women in our cities safe.

I have a suggestion, if you care.

We have a large population living in slums all over the city, on footpaths, and under the flyovers. People living in those places work as labourers on construction sites and as servants in bungalows, offices and factories. The stark reality is that Delhi “needs” them. Delhi cannot do without them––Delhi will come to a standstill if they are not there. Their children sell pirated bestsellers, used flowers, hand towels and ballpoint pens on traffic lights. To earn a livelihood, some of them take to crime. And, if one was to go by what our films depict, they are picked up by bigger fish to get their works accomplished.

Such places where survival is a daily chore, people are vulnerable. Those places can easily turn into nurseries for crime.

Convert those slums into double-storey accommodation with the very basic amenities (drinking water, sanitation and electricity). Give them medical facilities and schools. That will demolish some of the nurseries where little ones get to learn their basics of crime. How so ever difficult it might appear, it is achievable. All that is required is a strong will to do it.

A single court decision in the US––to legalise abortion––brought down the crime rate drastically. But that took nearly twenty years. If you give a decent livelihood to the poorest of the poor today, it is just likely that the positive effect might be felt twenty years hence.

Are you ready to wait that long, Mr Kejriwal?

Remember, a lot can be achieved in this world, if one is not bothered about who gets the credit for the achievement or, who reaps the harvest. Are you ready to switchover from the alleged Napoleon’s role to that of Boxer’s in the yet-to-be-conceptualised Animal Farm Revisited? Keep the answer to yourself.

At this juncture, may God bless you with the wisdom to choose the right path.

Yours truly,

Group Captain Ashok K Chordia (Re-attired)

An Indian Air Force Veteran

Cooking the Goose of the Gender

It is important to make sure that one doesn’t offend people by inadvertently using language that might be considered sexist. In these times of #MeToo, it is even more important to mind one’s P’s and Q’s. For several decades now, many words and well-accepted expressions have come to be seen as discriminatory––discriminatory against women, in particular. It could be because of the nature of job being done mainly by men in the bygone days e.g. businessman, postman and fireman etc. Some other words give a distinctly different identity to women than their male equivalent (e.g. actor/actress; mayor/ mayoress, steward/stewardess, heir/ heiress, hero/ heroine, manager/ manageress). Some of these words, while giving the women a different identity have, over a period of time, come to convey a somewhat different status for them.

Feminists and well-meaning people on either side of the gender divide have been trying hard to remove the bias in the language. So now we have words like chairperson or chair (instead of chairman), head teacher (instead of headmaster/ headmistress). Mrs, for a married woman is passé; Ms is the right form to use. It is also customary now to use a term, which was previously used exclusively for men to refer to both men and women. For example, authoress, poetess and actress, have been replaced by author, poet and actor. The more conscious of the English language users have begun using human race or humankind instead of mankind. And until acceptable words/ terms are coined, words like princess, tigress, lioness, abbess, duchess, usherette, seamstress and seductress etc. will remain in use. One is less likely to take offence.

We do not mind using he/ she, him/ her and his/ her any number of times in our correspondence to remain gender neutral. Here are some examples:

  • He/ She (the candidate) must report at the reception by 10 am.
  • The HR department will inform him/ her about the likely dates.
  • A scholar is expected to submit his/ her report in a month.
  • The student can seek advice from his/ her

While the linguists and the feminists have been striving to achieve gender neutrality, people are exercising their right to cook the goose of the gender. I know of a lady from the Hindi heartland of India who prefers to use the male verbs (in Hindi) for herself e.g. करता हूँ, खाता हूँ, जाता हूँ,… etc.

Mrs Indira Gandhi didn’t like to be called ‘Madam’. Legend has it that once when she was on a state visit to the US, the American President wanted to know (through the then Indian Ambassador, Mr BK Nehru) how to call her, “Madam Prime Minister or Prime Minister?” She said, “Tell the President I don’t care what he calls me; he can call me Mr Prime Minister or just Prime Minister. But tell him also that my colleagues call me Sir.”

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Cooking the Goose of the Gender

Are the editorial staff of the Times of India following in the footsteps of Mrs Gandhi’s colleagues?

 

मेरा भारत (वाकई) महान!

आजकल देश में बारहों महीने देश-भक्ति की लहर होती है। कोई न कोई  राजनीतिक दल या समुदाय किसी न किसी महान व्यक्ति को याद कर रहा होता है––कभी लोग गाँधी को, तो कभी भगत सिंह को; कभी नेहरू को तो कभी महाराणा प्रताप को याद करते हैं। कोई न मिले, तो लोग अपने श्रद्धा सुमन देश पर मर-मिटने वाले शहीद जवानों पर ही अर्पण कर देते हैं। देश-भक्ति के छोटे-बड़े हिलकोरों से भारत सदा मनमस्त रहता है। गणतन्त्र दिवस और स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर तो मानो देश-भक्ति की सुनामी ही आ जाती है।

राष्ट्रपर्वों पर राष्ट्रध्वज की शान निराली होती है। न जाने कहाँ-कहाँ से निकल कर तिरंगा हर हिलती-डुलती और चलती-फिरती वस्तु और वाहन पर शान से लहराता दिखाई देने लगता है। फिर झण्डा प्लास्टिक का हो, सिल्क का हो, या असली खादी का, कोई मायने नहीं रखता। देशवासियों की भावनाओं का ध्यान रखते हुए कुछ लोग कागज़-कपडे वाले मुद्दे को तूल नहीं देते, तो कुछ उस ‘तुच्छ’ मुद्दे को (फिलहाल) दरकिनार कर देते हैं। ऐसे समय तिरंगे की बिक्री शीर्ष पर होती है। और क्यों न हो, उसका एक-एक ताना-बाना देश प्रेम की भावना से जो रंगा होता है। लोग जो भी कहें, तिरंगा तिरंगा होता है, उसका भी अपना दिन होता है।

और फिर, ऐसे समय शब्द, सुर, ताल और लय कैसे भी हों––गली, नुक्कड़ और चौराहों पर लाउड-स्पीकरों पर देश-भक्ति से सराबोर गीत निर्जीव से निर्जीव व्यक्ति में प्राण फूँक देते हैं। इसी प्रकार, टीवी चैनलों पर देश-भक्ति से ओत-प्रोत सीरियलों और फिल्मों का अम्बार सा लग जाता है। एक प्रकार से देश-भक्तों में देश-भक्ति दर्शाने की होड़ सी लग जाती है।

देश भक्त फिल्म निर्माता और अभिनेता न केवल अपनी देश के युद्ध गौरव को दर्शाती बहुसितारा (मल्टीस्टारर) फिल्मों को इसी दौरान पर्दों उतरने की उधेड़बुन में रहते हैं, बल्कि सिद्धिविनायक मंदिर में माथा टेक कर उन फिल्मों की सफलता के लिए मन्नत भी मांगते हैं। भगवान फिल्म उद्योग की सुनता भी खूब है। देखिये न, लोग मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी को कम, सनी देओल को 1971 भारत-पाक युद्ध का नायक ज्यादा मानते हैं; मेरी कॉम से ज्यादा प्रियंका चोपड़ा को पहचानते हैं।

मेरा भारत (वास्तव में) महान है!

इन राष्ट्रीय पर्वों के बारे में मेरे बचपन की यादें सीदी-सादी हैं और आज, पचास साल बाद, भी बिलकुल स्पष्ट और ताजा हैं। क्यों न हों? बस्ते की झंझट नहीं, आधे दिन बाद स्कूल की छुट्टी हो जाती थी। ध्वजारोहण के बाद सब “वन्दे मातरं” गाते थे; प्रिंसिपल के भाषण के बाद देश भक्ति के कुछ गीत और नाटक होते थे। थोड़ी देर देश के वीर शहीदों के बारे में सोचते थे, उनसे प्रेरित होते थे। “भारत माता की जय” के नारे और वीर पुरुषों की गाथाएं बालमन को देश के प्रति उदात्त भावना से भर देती थीं। चाहे मोतीचूर के लड्डूओं के बँटते ही घर की तरफ गिल्ली-डंडा खेलने भागते थे, लेकिन भावना कुछ ऐसी होती थी कि कहीं भी, कभी भी, “जन गण मन….” की धुन कानों में पड़ती थी, तो सबकुछ छोड़ कर सीधे खड़े हो जाते थे। और फिर, पूरे वर्ष महारानी लक्ष्मीबाई, महाराणा प्रताप, शहीद भगत सिंह, चंद्र शेखर आजाद आदि की चर्चा होती थी। भावना कुछ ऐसी होती थी, जिसकी परिकल्पना सरलता से शब्दों में नहीं की जा सकती है।

मेरा भारत तब भी महान था!

फिर से वर्तमान में…

हाल ही में, मैं अपनी तीसरी पीढ़ी के एक बालक के साथ कार में सैर रहा था। बालक निश्चय ही मेधावी है। रास्ते में करीब साठ फुट ऊँचे खम्बे पर लहराता तिरंगा दिखाई दिया। झण्डा देख कर मेरा सीना गर्व से फूल गया। मैंने सम्मान से उसे निहारा और बालक से पूछा, “बेटा, जब आप अपना राष्ट्रीय ध्वज देखते हैं, तो आपके मन में कैसे विचार आते हैं?”

मेरा भारत महान!

उस अपेक्षापूर्ण प्रश्न के उत्तर की प्रतीक्षा करने में मुझे कोई ऐतराज नहीं था।

परन्तु…

परन्तु, बालक ने एक बार झंडे को और एक बार मुझे अर्थहीन दृष्टि से ताका। सच मानिये, उस छोटे से बालक ने मुझे, और (मेरे प्यारे) झंडे को “देखा नहीं”, उसने असल में हमें “ताका”। फिर वह तपाक से और भावहीनता से बोला, “नानाजी, वास्तव में, कुछ नहीं; तिरंगे को देख कर मेरे मन में कोई विचार नहीं आते हैं।”

मुझ पर मानो गाज गिर गयी। परन्तु मैं भी हार मानने वाला कहाँ था? भूतपूर्व वायु-योद्धा जो हूँ।

“क्या तिरंगा आपको देश के वीरों की और शहीदों की याद नहीं दिलाता है? इसे देख कर आप के मन में देश प्रेम की भावना जागृत नहीं होती है?” मैंने बच्चे से हर शब्द पर अत्यधिक जोर देकर पूछा। मेरी उम्मीदों का बांध और ऊँचा हो चुका था।

उस बालक के उत्तर ने मेरी उम्मीदों के बांध को तहस-नहस कर दिया और उसकी तबाही से आने वाले सैलाब में मैं बह गया, डूब गया। अवाक, निस्तब्ध… मैं उसे देखता ही रह गया। वह बड़ी सहजता से बोला, “नानाजी, मुझे इतना अधिक होमवर्क करना होता है कि मेरे पास देश और तिरंगे के विषय में सोचने का समय ही नहीं बच पता है।”

हतप्रभ, मैं उस नादान को पथराई आँखों से देखता ही रह गया।

भारी मन से मैंने कार आगे बढ़ा दी।

अभी थोड़ा ही चले थे कि एक विशाल विज्ञापन-पट (होर्डिंग) पर गाँधी जी की भव्य तस्वीर देखी। मेरे मन में देश-भक्ति का उबार एक बार फिर आया। आया और चला गया।  मेरी हिम्मत नहीं हुई कि नन्हे बालक से पूछ लूँ, “ये कौन हैं?” मन में आशंका थी कि कहीं बच्चा जवाब में यह न कह दे, “नानाजी, यह तो बेन किंग्सले है।”

निश्चित ही, मेरा भारत महान है। सदैव रहेगा।

देश प्रेम और देश भक्ति पर अभी और कहना बाकी है…

(यह पोस्ट मेरे अंग्रेजी पोस्ट “I Love My India” का हिंदी रूपान्तर है, जिसके लिए मैं अपनी प्रिय बहन प्रोफेसर रीता जैन का आभारी हूँ।)

The Red Marble & Thieves

I guess you remember Kanti, the little entrepreneur who wanted to make a fortune by growing lemons on his head.

So, without ado, I bring you here another episode from his eventful childhood. It might evoke different emotions in you––from humour to sympathy to indifference––depending on what strikes your imagination.

But, for Kanti it was a traumatic experience. Read on…

One evening, Kanti came charging into the house and began rummaging the only drawer he was assigned in a chest of drawers to keep his belongings. It was a little beyond his reach even when he stood on the tips of his toes; he had to climb a stool to reach it. That inability to access his drawer was one of the main reasons he wanted to grow tall, really soon. And, that was the reason he accepted everything his mother gave him. “Eat it; it’ll help you grow tall,” she would say.

Kanti grew desperate as he looked for something, which seemed to evade his eyes. In a last ditch effort, he pulled out the full drawer, the weight of which, his tiny frame couldn’t bear. And, lo and behold, he lost balance and fell to the ground with a massive thud. All his toys came tumbling out––three cars, two tennis balls, crayons, pencils, a kaleidoscope, a piece of coloured glass, a top, Ludo and Snakes & Ladders board and a dozen other things.

“Maaa… heelppp!” Kanti yelled as he fell.

“What happened?” Maya, a concerned mother ran out of the kitchen in response to the distress call of her little one. She was aghast at the sight of Kanti lying spread-eagled on the floor facing the roof, a bit dazed; the drawer see-sawing on his little chest and a dozen and more marbles still traversing different paths on the floor in the hope of finding a state of equilibrium.

“Oh my God!” She staggered, “What happened? I hope you aren’t hurt, my child!?” She enquired with great concern even as she stepped on a marble and tripped and tumbled. Only a heavenly intervention enabled her to grasp the arm of a dining chair and avoid a fall. In one quick action she removed the drawer from Kanti’s chest and helped him on his feet.

“I’m fine,” said Kanti. But a face contorted by a spasm of pain, and a clearly visible limp in his gait gave away his actual condition.

“What happened,” was the repeated question, the doting mother asked as she hugged him and looked for signs of injuries.”

“Nothing really!” said Kanti. “I was looking for a red marble.”

“Now Kanti, you could have waited for me, as you always do. I would have helped you with it.”

“But you were in the kitchen and I was in too great a hurry. I couldn’t have waited.”

“Couldn’t have waited…. What do you mean?” Maya distorted her eyebrows to lay stress on the questions.

Unmindful of Maya’s concern, Kanti started picking up the marbles strewn on the floor. He was still looking for the ‘red’ marble.

Maya gave a glass of water to Kanti who still appeared hassled. “Tell me, what is the matter? And, look there. Yes there, under the chair. There’s your ‘red’ marble.” Maya said as she pointed at it.

The Red Marble

Greatly relieved, Kanti picked up the ‘red’ marble and pocketed it. He then hugged her mother tightly (Shashi Tharoor would rather have called the hug, a “kwtch”. A “kwtch” is more than a hug).

“Maa, you have saved me from ending up in prison.” His eyes welled and a tear rolled down his little pink cheek.

Maya’s face wore a big question mark.

“It’s like this… This morning I was playing marbles with Dinesh when he was called by his mother. He quit the game but left his red marble in a hope to re-join soon. But he did not return. So I picked up all the marbles and returned home. I carried his “red” marble too, to hand it over to him later.”

Curiosity was killing Maya: “Ending up in Jail? Red marble? What was going on in Kanti’s mind?”

Kanti continued with the seriousness of a grown up.

“Just a while ago, when I was playing outside with Veena (remember Veena? Kanti’s cousin of his age, and his living encyclopaedia of worldly knowledge) we saw a policeman passing by. In his tow was a handcuffed man. Veena told me that he was a thief being taken to the jail where he would be kept away from his family and friends for many days. She told me that a thief is a person who takes away someone else’s belongings without the owner’s consent. She also told me that…”

“Of course, thieves get punished. So how does that bother you?” Maya was impatient and wouldn’t let Kanti complete his story.

“I have taken Dinesh’s red marble without his consent. I am afraid the police will jail me for being a thief. I don’t want to be away from you and Dad,” sobbed Kanti.

“Oh my dear. You are not a thief. You have taken the marble only to help your friend. Thieves take away things with bad intention; not to return them,” Maya allayed Kanti’s anxiety. “Now go and handover the marble to Dinesh.”

Kanti was panting when he returned from Dinesh’s house. Maya smiled at him. “So that’s the end of it.” She thought.

She couldn’t have been more wrong.

Later, in the evening at the dinner table the three––Kanti, Anil (his father) and Maya––exchanged notes on how each spent the day. That was the family’s way of unwinding every day. Maya was the first one to speak. She had nothing to talk about her day. So she told Anil about the red marble and Kanti’s woe that afternoon. She chuckled as she shared the incident. Anil struggled to hold back the impulse to smile at the story when he saw a quiet Kanti lost in some thoughts.

“So Kanti, did you return the red marble to Dinesh,” Anil asked Kanti to get him involved in the conversation.

“Yes Dad, I did… and Dinesh was happy to get it back.” Kanti still wore a blank look. His discomfiture couldn’t escape Anil’s eyes.

“Is there something still troubling you, Kanti?” Anil poured all the tenderness that a caring father could in that question.

“Dad, Veena told me a lot of things about the thieves and the jail. She told me how they make the inmates clean, sweep and work hard in the jail. The police even shave off their heads.” Anil was all ears, nodding occasionally as he absorbed Kanti’s bits.

Then Kanti paused and looked around as if to make sure that no one else was listening. Once assured of the privacy, he brought his mouth close to his father’s ear and started talking in a hushed tone. “And Dad, do you know…?” He glanced around the room again and spoke in a whisper, “We are surrounded by thieves! Brij Mohan Bhaiya (the milkman), Ramu Bhaiya (the dhobi), and… even Ramesh Uncle (Major Ramesh, a friend of Anil)––all of them have shaven heads. As Veena said, they must have served sentences in the jail.”

Rest of Anil’s evening, and the following weekend was spent in convincing Kanti that all men with shaven heads were not thieves. Anil realised how easy it was to teach a child a new thing rather than erase things from its tender mind.

Dead Men Tell No Tales. Do Dead Terrorists Do?

There was carnage in Sri Lanka last month on Easter Sunday. The Lankans had somehow missed out on (read “doubted”) the lead provided by the Indian intelligence agencies and paid a heavy price for it (Aftermath of Lanka Blasts: Of Open Stable Doors and Bolting Steeds). Perhaps some of the blasts could have been averted had they heeded the Indian warning. Oh really!?  But then those very Indian agencies that provided a ‘clue’ to the Sri Lankans could not place a finger on the Pulwama terror attack in time. Was it a ‘lapse’ or ‘failure of intelligence’ as the media often dubs it? Can they be held responsible (squarely) for the terror strike? There are no straight answers to those rhetorical questions. There can’t really be. One can debate them, with no conclusion whatsoever, till the cows come home.

Needless to say, the job of the intelligence agencies is becoming tougher by the day. Sifting the mountains of information that they come across and zeroing on what matters, before the terrorists execute their missions, is not an enviable job. It is definitely more challenging than looking for a needle in the haystack.

Time to take stock

Dead men tell no tales but dead terrorists do. If one were to go by the media reports, the security forces have recovered a sketch from the body of a terrorist killed in an encounter in Shopian earlier this week. The sketch indicates that terror groups are planning suicide attacks at Indian Air Force bases at Srinagar and Awantipur.

How seriously, can such ‘sketches’ or any other clues be taken? Is another Pathankot, Uri or Pulwama brewing? May be; may not be. Could this ‘sketch’ just be a red herring; could the actual target be different––Delhi? Mumbai? Bengaluru? Hyderabad? Noida? Ghaziabad?

Read on, for a lesson from the past…

Target?

At a time when the World War II was peaking and the Germans and the Italians were wondering about the Allied plans in the Mediterranean, the British engineered a smart ruse. They got the body of a soldier, who had died of pneumonia and dressed him in the attire of a Royal Navy Courier and gave him the identity of one ‘Major Martin’. They secured a briefcase to his wrist, the way classified documents were carried in those days, and left his body floating at sea, off a Spanish Port. The briefcase contained ‘secret’ letters––addressed to British diplomats in Cairo indicating an Allied intention of landings in Greece. As expected, the dead Major Martin was found by some Spaniards and handed over to their Government officials. The Spaniards photographed the documents before handing over the body (and the briefcase) to the British Naval Attaché in Madrid. And again, as expected the Spaniards turned over the photographs of the documents to the Germans who took them to be genuine.

The ruse worked; the Germans were grossly misled. The British and the American airborne forces landed at Sicily and ‘surprised’ the Germans.

“Dead men (and may be, dead terrorists) can tell cooked up tales to cover their trails.”

So?

That terror groups in Jammu and Kashmir are planning attacks in the Valley is a new normal. In this instance the intelligence agencies have logically concluded that Pakistan-based groups might carry out an attack on May 23, the day when counting of votes for Lok Sabha election 2019 will take place. Although, as per the reports, Indian Air Force bases in Srinagar and Awantipur are the likely targets, nothing prevents the terrorists from changing their mind. Or, do they already have a ‘different’ plan? Who knows? Therefore, a really tough time awaits the intelligence agencies and security forces.

Three simple things that a common man can do to strengthen their hands are:

  • Share information only if it is a must, after verifying the truthfulness.
  • Travel and congregate only if it is a must––roads clear of undue traffic, and less crowded public spaces, enhance the efficiency of the intelligence and security personnel.
  • Stay vigilant.

Not a tall order?!