“दान” बनाम “अर्पण”

अभिस्वीकृति

बात अस्सी के दशक की है। टाइम्स आई रिसर्च फाउंडेशन के माध्यम से भारतीय डाक तार विभाग ने नेत्र दान विषय पर डाक टिकिट जारी करने के लिए एक प्रतियोगिता आयोजित की थी। इस तरह के सामाजिक अभियानों में मेरी आस्था ने मुझे इस पहल में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। मेरी कल्पना ने एक उड़ान भरी और मैं डाक टिकिट के लिए एक नमूना बनाने जुट गया। जल्दी ही मैंने अपनी प्रविष्टि टाइम्स आई फाउंडेशन को भेज दी।

दो शब्द मेरी प्रविष्टि के बारे में…

नेत्र दान

एक तरफ मैंने एक मानवीय चेहरे का रेखाचित्र बनाया था जिसमें आँख की जगह रिक्त (सफ़ेद) स्थान छोड़ा था जो कि अंधापन दर्शा रहा था। दूसरी तरफ मैंने एक हथेली बनाई थी जिसकी मुद्रा भगवानों की तस्वीरों में आशीर्वाद देते हाथ की होती है। हथेली के मध्य में मैंने एक आँख बनाई थी जिससे निकलती प्रकाश की किरणे अंधे व्यक्ति पर पड़ रही थीं। मेरी कल्पना में हथेली में बनी आँख से निकल कर अंधे चेहरे पर पड़ती प्रकाश की किरणे दृष्टि (नेत्र) दान की द्योतक थीं। मेरे मित्रों ने मेरी कलाकृति की खूब प्रशंसा की थी। निश्चय ही मैं अपने प्रयास से संतुष्ट था। टाइम्स आई रिसर्च फाउंडेशन ने भी मेरी प्रविष्टि को स्वीकार कर लिया था। कुछ ही समय में मैं उस प्रतियोगिता को भूल सा गया था।

एक दिन, अचानक ही मेरी दृष्टि टाइम्स ऑफ़ इंडिया में भारतीय डाक-तार विभाग द्वारा नेत्र दान पर जारी किये गए डाक टिकिट की तस्वीर पर पड़ी। वह तस्वीर मेरी भेजी हुई प्रविष्टि से बहुत मिलती थी। पहली नज़र में तो मुझे वह मेरी ही भेजी हुई कलाकृति लगी। गौर से देखने पर एक छोटी-सी, परन्तु अत्यंत ही अर्थपूर्ण भिन्नता दिखाई दी जिसने जीवन के बारे में मेरे दृष्टिकोण को सदा के लिए बदल दिया।

नेत्रार्पण

डाक टिकिट के लिए चयनित एवं पुरस्कृत चित्र में एक की जगह दो हथेलियां प्रदर्शित की गयीं थीं। दोनों का रुख आसमान की तरफ था। हाथों की मुद्रा ऐसी थी मानो मंदिर में चढ़ावा दिया जा रहा हो। हथेलियों में एक आँख चित्रित थी जिसमें से निकल कर प्रकाश की किरणे अंधे चेहरे पर पड़ रही थीं––मेरे बनाए चित्र की तरह। अंतर केवल इतना था कि तस्वीर से एक भाव छलक रहा था जो मेरे बनाए चित्र से स्पष्ट रूप से नदारद था –– ‘अर्पण’ करने का भाव। उस चित्र में दाता-याचक का समीकरण नहीं था अपितु दृष्टि देने वाले की विनम्रता और दृष्टि पाने वाले की गरिमा छलक रही थी।

यद्यपि वह डाक टिकिट ‘नेत्र दान’ के लिये प्रेरणा देने के लिए था, उस दिन मैंने ‘दान’ और ‘अर्पण’ शब्दों के अर्थ के अंतर को भली-भांति जाना था; ‘दान’ शब्द में निहित अहंकार को समझा था और ‘अर्पण’ की भावना का अनुभव कर पाया था।

सोचता हूँ, क्या नाम बदलने से लोगों की सोच में बदलाव आ सकता है? क्या लोग दान की भावना को छोड़ अर्पण की भावना को अपना सकते हैं? नेत्रार्पण; रक्तार्पण; देहार्पण?

इस विषय पर इतना लिख कर मैं अपनी कलम को अवकाश दे चुका था। परन्तु मेरी प्रिय बहन की एक टिप्पणी ने मुझे कुछ और शब्द लिखने के लिए उत्साहित किया है। मेरा लेख पढ़कर मेरी बहन ने हास्य-पूर्ण तरीके से मेरा ध्यान “कन्यादान” और “कन्यार्पण” की ओर आकर्षित किया है और मेरी प्रतिक्रिया जाननी चाही है। मैं समझता हूँ कि आज के भारत में इन दोनों के लिए कोई स्थान नहीं है। इनके बारे में सोचना भी पाप है। 

नोट: मेरे इस लेख का उद्देश्य केवल और केवल “दान” और “अर्पण” की भावनाओं में जो अंतर मैंने समझा है उसको अपने पाठकों से साझा करना है। इस में प्रदर्शित डाक टिकिट की जो छवियाँ हैं, वे प्रतीकात्मक हैं। वास्तविक डाक टिकिट और मेरे द्वारा भेजी प्रविष्टि इस लेख में दिखाए गए चित्रों से भिन्न थीं। आशा करता हूँ कि भारतीय डाक विभाग और टाइम्स आई रिसर्च फाउंडेशन, दोनों ही इस मामले को कोई तूल न देंगे।

बड़ी सोच!?

सुबह से करीम बारह कारें साफ कर चुका था। यह तेहरवीं गाड़ी थी। हाथ में कपडा लिए, वह डर-डर कर उस चमचमाती लाल फेरारी कार की तरफ बढ़ा और फिर ठिठका और रुक ही गया। वह नोएडा सेक्टर-18 के रेडिसन ब्लू होटल के सामने पार्क की गयी गाड़ियों पर कपड़ा मार कर दो पैसे कमा लेता था। प्रायः महंगी कारों की सफाई करने से ज्यादा पैसे मिल जाया करते थे। उसके मन में पनपते डर का एक कारण था। पिछले हफ्ते ही एक कार मालिक ने उसकी पिटाई कर दी थी। उसका का गुनाह था––कार के मालिक से बिना पूछे गाड़ी को हाथ लगाना। ग्यारह साल के करीम को दो चांटों के लगने से होने वाली शारीरिक पीड़ा का आभास तक नहीं हुआ था परन्तु अपने साथ हुई बदसलूकी से लगी चोट का दर्द वह भुला नहीं पाया था।

उसने उस फेरारी जितनी आलिशान कार पहले कभी नहीं देखी थी। चुम्बकीय आकर्षण था उस कार में; वह उस के नज़दीक जाकर उसे निहारने लगा। उसका लाल रंग, उसके बम्पर, उसके सामने की जाली, उसकी लाइटें, उसका डैशबोर्ड, उसकी साफ-सुथरी सीटें… एक दम नई थी वह कार। अभी तो उसकी सारी सीटों के पॉलिथीन के कवर भी नहीं उतरे थे और बोनट पर सिन्दूर से बना स्वस्तिक का निशान बिलकुल ताज़ा लग रहा था। स्टीयरिंग पर बंधी माता रानी की चमकवाली लाल चुन्नी, और साइलेंसर पर बंधा काले रंग के धागे का लच्छा कार के मालिक की देवी माता में आस्था को दर्शा रहा था। 

करीम अपने आप को रोक नहीं पाया था; ताका-झांकी कर रहा था। अपने चार दिन पुराने अनुभव को भूल सा गया था। तभी उसने लम्बे कदम भरते एक छः फुटे नौजवान को अपनी तरफ आते देखा। वह मोबाइल पर किसी से बात कर रहा था। करीम सहम सा गया। पल भर में उसे फिर से चार दिन पहले मर्सिडीज़ के मालिक से पड़े झापड़ याद आ गए।

“ओके अनु… तो फिर आज शाम हम गोल्डन ड्रैगन जा रहे हैं। मैं तुम्हें छः बजे घर से पिक अप करूंगा। वी विल गो फॉर अ लॉन्ग ड्राइव बिफोर डिनर,…  बाय बाय! लव यू।” कहते हुए युवक ने मोबाइल बंद किया और करीम पर प्रश्न भरी निगाहें डालीं। करीम ने कार को हाथ नहीं लगाया था फिर भी वह डर-सहम सा गया।

अगर नज़रें क़त्ल कर सकतीं तो युवक की नज़रों से करीम की मौत संभावित थी।

“स स स ररर, कार साफ कर दूँ?” करीम हाथ जोड़ कर मिमियाने लगा। “अच्छे से चमका दूंगा। यह देखिये, यहाँ पर धूल बैठ गयी है।”

युवक को सोचता हुआ देख कर करीम ने थोड़ा साहस जुटाया और आगे बोला, “सर, सिर्फ पाँच मिनट लूँगा।” छोटी सी उम्र में करीम ने यह जान लिया था की बड़े लोगों को अच्छा लगता है जब कोई उनके समय की कद्र करे। युवक को ऐसा लगा जैसे कि करीम ने उसे कुछ और फोन कॉल्स करने का मौका दे दिया हो। उसने सिर हिला कर करीम को कार साफ करने की अनुमति दे दी और फिर से मोबाइल पर एक नंबर डायल करने लगा।

“हैलो, मैं अमित कालरा बोल रहा हूँ… यस, यस, मैंने ही कॉल किया था।  जी हाँ, टेबल फॉर टू… कैंडल लाइट… ओके, कनफर्म्ड।”

अमित कालरा कॉल किये जा रहा था। उन कॉल्स के दौरान उसकी नज़र करीम पर टिकी थी।

करीम बड़ी तन्मयता से कार साफ कर रहा था। कपड़े से पोंछ कर वह अलग-अलग कोण से कार को देख कर तस्सली कर रहा था कि चमक में कहीं कमी न रह जाय। करीम की मेहनत से युवक प्रभावित था। करीम के फटे कपडे देख कर उसे बच्चे पर दया भी आने लगी थी। मन ही मन उसे अच्छी टिप देने का निश्चय कर लिया था अमित ने।

“हेलो भैया, व्हाट अ फैबुलस कार? इट रिएली फ्लाईज़… सुपर्ब… आई एम एंजोयिंग ड्राइविंग इट। तुसि ग्रेट हो। आई लव यू, बिग ब्रदर।” अमित ने एक और कॉल किया।

अमित कालरा आज खुश था। और क्यों न होता? उस के मन में अपनी नई फेरारी में पहली बार अनु को सैर कराने की उमंग जो थी। पर वह असमंजस में भी था, “यमुना एक्सप्रेसवे पर जाना ठीक होगा या डीएनडी पर सैर का आनंद आएगा? आज डिनर के वक्त हिम्मत कर के अनु को प्रोपोज़ कर ही दूंगा। उसे फूल कम पसंद हैं, डार्क चॉकलेट्स ठीक रहेगीं…।”

मई की गर्मी में भी अमित कालरा वसंत ऋतु में खिले फूलों की ताज़गी को महसूस कर रहा था।

न जाने कैसे पंद्रह मिनट बीत गए। मन में चल रहे अनेक संवादों में अमित कुछ इस तरह खो गया था कि समय का पता ही नहीं चला। जब विचारों के भंवर से अमित उबरा तो अपने सामने करीम को पाया। अमित उस गरीब की मुस्कुराहट के पीछे छुपी गम्भीरता को महसूस कर रहा था। अमित ने पर्स खोल कर करीम के हाथ में एक पांच सौ रुपये का नया नोट रख दिया।

निस्संदेह आज कुछ खास बात थी; अमित के मन में उदारता उमड़ रही थी। उम्मीद से बहुत अधिक पैसे पाकर करीम की ख़ुशी का कोई ठिकाना न रहा। उसका चेहरा अब एक खुली किताब था जिसे अमित आसानी से पढ़ सकता था। “सर, ये तो मेरे तीन दिन से ज्यादा की कमाई हो गयी,” करीम ख़ुशी से पगला सा गया ।

“क्या करोगे इन पैसों का,” अमित ने वैसे ही गाड़ी में बैठते हुए मुस्कुराते हुए पूछ लिया। करीम के उत्तर में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी।

“सर, सीधा घर जाऊँगा। अगले कुछ दिन गाड़ियाँ साफ नहीं करूंगा। पढाई करुँगा। अगले हफ्ते परीक्षा है। इन पैसों से घर का काम चल जाएगा।” करीम की बातें सुन कर अमित के मन में अचानक उत्सुकता और दया के भावों की छोटी सी सुनामी आ गयी।

“कहाँ रहते हो?”

“सर, पास ही में; सेक्टर-52 में जो फ्लाईओवर बन रहा है उसके पास की झुग्गिओं में मेरा घर है। अम्मी वहीँ साइट पर काम करती हैं।”

“कालरा कंस्ट्रक्शंस की साइट पर?”

“सर नाम तो नहीं मालूम पर हमारे मालिक ऐसी ही लाल गाड़ी में कभी-कभी आते हैं। ताड़ जैसे ऊँचे हैं, बिलकुल आप जैसे दिखते हैं।”

अमित कालरा के चेहरे पर मुस्कराहट का आना स्वाभाविक था––कालरा कंस्ट्रक्शंस उसके पिता की कंपनी थी जिसे उसका भाई सुमित चलाता था। अमित ने अभी-अभी एमिटी यूनिवर्सिटी से एम बी ए पास किया था। सी.जी.पी.ए.  बहुत कम था––डिग्री तो नाम के लिए चाहिए थी, आगे चल कर तो घर का बिज़नेस ही संभालना था। घर पर सभी बहुत खुश थे।

“आओ में तुम्हें वहाँ छोड़ दूँगा। मैं उधर ही जा रहा हूँ,” अमित के मन में उदारता और दया भाव ने एक और हिलकोरा लिया। उसने मुस्कुराते हुए करीम को कार में बैठने का इशारा किया। अमित सोच रहा था कि उस गरीब की जिंदगी का वह एक बड़ी यादगार वाला दिन होगा। अमित को ख़ुशी थी कि वह उस बच्चे को एक खास ख़ुशी देने जा रहा था। उसे, खुद को होने वाली अनुभूति में कहीं––थोड़ा सा सही––घमंड घुला हुआ था।

करीम सकपकाया। वह सपने में भी ऐसी कार में बैठने की बात नहीं सोच सकता था। वह कार के खुले दरवाजे की ओर बढ़ा और रुक गया। फिर जल्दी से उसने अपनी टूटी चप्पलें––जिनकी सेफ्टी पिन से मरम्मत की गयी थी––उतारी और उनको थपथपा कर उनकी धूल को निकलाकर उन्हें साफ किया। फिर जल्दी से जेब से एक गन्दा सा कपड़ा निकाला और उसे कार की पॉलिथीन से कवर की गयी सीट पर बिछा दिया––”सर, रुमाल फैला देता हूँ, सीट गन्दी नहीं होगी।”

करीम की ख़ुशी का ठिकाना न था।

करीम की ख़ुशी में अमित आनंदित हो रहा था। सेक्टर-18 के गुरूद्वारे के सामने से निकलते हुए अमित के मन में न जाने क्या बात आयी कि सीधे सेक्टर-52 की तरफ जाने के बजाय उसने जी.आई.पी. के सामने यू-टर्न ले लिया और फिल्म सिटी की ओर चल पड़ा। वह चाहता था कि करीम को थोड़ी लम्बी सैर कराए।

खुश लेकिन सहमा सा, करीम कभी कार में तो कभी बाहर देख रहा था। कार के स्टीरियो पर बजते गाने की आवाज़ कम करते हुए अमित ने बोलना शुरू किया, “कैसा लग रहा है?”

“बहुत अच्छा,” पुलकित करीम चहचहाया।  

“जानते हो, मुझे यह कार मेरे भाई ने मेरे बर्थडे पर गिफ्ट में दी है?”

“अच्छा!?” करीम की आँखों में प्रश्न और विस्मय से भरी प्रशंसा थी।

“वे तो मुझे रेंजरोवर देना चाहते थे पर मैं फेरारी के लिए अड़ गया,” अमित खिलखिलाया और फिर जोर देकर बोला, “… … सोच बड़ी होनी चाहिए।”

ये बातें करीम की समझ से बाहर थीं। फिर भी वह जवाब में आँखें बड़ी कर के सिर हिला रहा था।

“और घूमना है?”

“नहीं सर, बस अब मुझे उतार दें।”

“कोई बात नहीं, मैं तुम्हें साइट पर छोड़ दूँगा।”

महामाया फ्लाईओवर की ओर से एक लम्बा चक्कर लगाते हुए अमित ने कार को सेक्टर-52 की झुग्गिओं के सामने ला कर रोक दिया और करीम की और देख कर एक बार फिर मुस्कुराया, “परीक्षा के लिए बेस्ट ऑफ़ लक।”

“थैंक यू, सर,” करीम ने कार का दरवाज़ा खोलने की कोशिश करते हुए कहा। उससे दरवाजा न खुलते देख अमित ने मदद की। कार से उतरते-उतरते करीम रुक गया और अमित की ओर देख कर विनती की, “सर, प्लीज एक मिनट रुक जायें, मैं अभी लौट कर आता हूँ।”

करीम की मेहनत और लगन पर फिदा अमित ने हामीं भर दी और अपना मोबाइल उठा लिया और व्हाट्सएप मैसेजेस देखने लगा।

दो ही मिनट में करीम वापस आ गया। उसकी गोद में एक छोटा सा बच्चा था जिसे वह बड़ी मुश्किल से उठा पा रहा था। कार के पास आकर वह अमित से बोला, “सर, ये मेरा भाई आरिफ है।” फिर आरिफ को ऊँगली से दिखा कर बोला, “आरिफ, पता है, आज इन साब ने मुझे इस मोटर में बिठा कर घुमाया है। ये इनके बड़े भाई ने इनको तोहफे में दी है। एक दिन मैं भी तुझे ऐसी ही गाड़ी तोहफे में दूँगा।”

अमित ने एक मिनट बाद कार आगे बढ़ा दी। फिर देर तक कार के रियर व्यू मिरर में दोनों बच्चों को खिलखिला कर टा-टा करते देखता रहा।

“सोच बड़ी होनी चाहिए।” अमित की अपनी ही आवाज़ उसके कानो में गूँज रही थी।

मेरा भारत (वाकई) महान!

आजकल देश में बारहों महीने देश-भक्ति की लहर होती है। कोई न कोई  राजनीतिक दल या समुदाय किसी न किसी महान व्यक्ति को याद कर रहा होता है––कभी लोग गाँधी को, तो कभी भगत सिंह को; कभी नेहरू को तो कभी महाराणा प्रताप को याद करते हैं। कोई न मिले, तो लोग अपने श्रद्धा सुमन देश पर मर-मिटने वाले शहीद जवानों पर ही अर्पण कर देते हैं। देश-भक्ति के छोटे-बड़े हिलकोरों से भारत सदा मनमस्त रहता है। गणतन्त्र दिवस और स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर तो मानो देश-भक्ति की सुनामी ही आ जाती है।

राष्ट्रपर्वों पर राष्ट्रध्वज की शान निराली होती है। न जाने कहाँ-कहाँ से निकल कर तिरंगा हर हिलती-डुलती और चलती-फिरती वस्तु और वाहन पर शान से लहराता दिखाई देने लगता है। फिर झण्डा प्लास्टिक का हो, सिल्क का हो, या असली खादी का, कोई मायने नहीं रखता। देशवासियों की भावनाओं का ध्यान रखते हुए कुछ लोग कागज़-कपडे वाले मुद्दे को तूल नहीं देते, तो कुछ उस ‘तुच्छ’ मुद्दे को (फिलहाल) दरकिनार कर देते हैं। ऐसे समय तिरंगे की बिक्री शीर्ष पर होती है। और क्यों न हो, उसका एक-एक ताना-बाना देश प्रेम की भावना से जो रंगा होता है। लोग जो भी कहें, तिरंगा तिरंगा होता है, उसका भी अपना दिन होता है।

और फिर, ऐसे समय शब्द, सुर, ताल और लय कैसे भी हों––गली, नुक्कड़ और चौराहों पर लाउड-स्पीकरों पर देश-भक्ति से सराबोर गीत निर्जीव से निर्जीव व्यक्ति में प्राण फूँक देते हैं। इसी प्रकार, टीवी चैनलों पर देश-भक्ति से ओत-प्रोत सीरियलों और फिल्मों का अम्बार सा लग जाता है। एक प्रकार से देश-भक्तों में देश-भक्ति दर्शाने की होड़ सी लग जाती है।

देश भक्त फिल्म निर्माता और अभिनेता न केवल अपनी देश के युद्ध गौरव को दर्शाती बहुसितारा (मल्टीस्टारर) फिल्मों को इसी दौरान पर्दों उतरने की उधेड़बुन में रहते हैं, बल्कि सिद्धिविनायक मंदिर में माथा टेक कर उन फिल्मों की सफलता के लिए मन्नत भी मांगते हैं। भगवान फिल्म उद्योग की सुनता भी खूब है। देखिये न, लोग मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी को कम, सनी देओल को 1971 भारत-पाक युद्ध का नायक ज्यादा मानते हैं; मेरी कॉम से ज्यादा प्रियंका चोपड़ा को पहचानते हैं।

मेरा भारत (वास्तव में) महान है!

इन राष्ट्रीय पर्वों के बारे में मेरे बचपन की यादें सीदी-सादी हैं और आज, पचास साल बाद, भी बिलकुल स्पष्ट और ताजा हैं। क्यों न हों? बस्ते की झंझट नहीं, आधे दिन बाद स्कूल की छुट्टी हो जाती थी। ध्वजारोहण के बाद सब “वन्दे मातरं” गाते थे; प्रिंसिपल के भाषण के बाद देश भक्ति के कुछ गीत और नाटक होते थे। थोड़ी देर देश के वीर शहीदों के बारे में सोचते थे, उनसे प्रेरित होते थे। “भारत माता की जय” के नारे और वीर पुरुषों की गाथाएं बालमन को देश के प्रति उदात्त भावना से भर देती थीं। चाहे मोतीचूर के लड्डूओं के बँटते ही घर की तरफ गिल्ली-डंडा खेलने भागते थे, लेकिन भावना कुछ ऐसी होती थी कि कहीं भी, कभी भी, “जन गण मन….” की धुन कानों में पड़ती थी, तो सबकुछ छोड़ कर सीधे खड़े हो जाते थे। और फिर, पूरे वर्ष महारानी लक्ष्मीबाई, महाराणा प्रताप, शहीद भगत सिंह, चंद्र शेखर आजाद आदि की चर्चा होती थी। भावना कुछ ऐसी होती थी, जिसकी परिकल्पना सरलता से शब्दों में नहीं की जा सकती है।

मेरा भारत तब भी महान था!

फिर से वर्तमान में…

हाल ही में, मैं अपनी तीसरी पीढ़ी के एक बालक के साथ कार में सैर रहा था। बालक निश्चय ही मेधावी है। रास्ते में करीब साठ फुट ऊँचे खम्बे पर लहराता तिरंगा दिखाई दिया। झण्डा देख कर मेरा सीना गर्व से फूल गया। मैंने सम्मान से उसे निहारा और बालक से पूछा, “बेटा, जब आप अपना राष्ट्रीय ध्वज देखते हैं, तो आपके मन में कैसे विचार आते हैं?”

मेरा भारत महान!

उस अपेक्षापूर्ण प्रश्न के उत्तर की प्रतीक्षा करने में मुझे कोई ऐतराज नहीं था।

परन्तु…

परन्तु, बालक ने एक बार झंडे को और एक बार मुझे अर्थहीन दृष्टि से ताका। सच मानिये, उस छोटे से बालक ने मुझे, और (मेरे प्यारे) झंडे को “देखा नहीं”, उसने असल में हमें “ताका”। फिर वह तपाक से और भावहीनता से बोला, “नानाजी, वास्तव में, कुछ नहीं; तिरंगे को देख कर मेरे मन में कोई विचार नहीं आते हैं।”

मुझ पर मानो गाज गिर गयी। परन्तु मैं भी हार मानने वाला कहाँ था? भूतपूर्व वायु-योद्धा जो हूँ।

“क्या तिरंगा आपको देश के वीरों की और शहीदों की याद नहीं दिलाता है? इसे देख कर आप के मन में देश प्रेम की भावना जागृत नहीं होती है?” मैंने बच्चे से हर शब्द पर अत्यधिक जोर देकर पूछा। मेरी उम्मीदों का बांध और ऊँचा हो चुका था।

उस बालक के उत्तर ने मेरी उम्मीदों के बांध को तहस-नहस कर दिया और उसकी तबाही से आने वाले सैलाब में मैं बह गया, डूब गया। अवाक, निस्तब्ध… मैं उसे देखता ही रह गया। वह बड़ी सहजता से बोला, “नानाजी, मुझे इतना अधिक होमवर्क करना होता है कि मेरे पास देश और तिरंगे के विषय में सोचने का समय ही नहीं बच पता है।”

हतप्रभ, मैं उस नादान को पथराई आँखों से देखता ही रह गया।

भारी मन से मैंने कार आगे बढ़ा दी।

अभी थोड़ा ही चले थे कि एक विशाल विज्ञापन-पट (होर्डिंग) पर गाँधी जी की भव्य तस्वीर देखी। मेरे मन में देश-भक्ति का उबार एक बार फिर आया। आया और चला गया।  मेरी हिम्मत नहीं हुई कि नन्हे बालक से पूछ लूँ, “ये कौन हैं?” मन में आशंका थी कि कहीं बच्चा जवाब में यह न कह दे, “नानाजी, यह तो बेन किंग्सले है।”

निश्चित ही, मेरा भारत महान है। सदैव रहेगा।

देश प्रेम और देश भक्ति पर अभी और कहना बाकी है…

(यह पोस्ट मेरे अंग्रेजी पोस्ट “I Love My India” का हिंदी रूपान्तर है, जिसके लिए मैं अपनी प्रिय बहन प्रोफेसर रीता जैन का आभारी हूँ।)

सलीम, जूता पालिश और देश-भक्ति

जून की निर्दयी गरमी थी। मैं टुंडला रेल्वे स्टेशन पर अपनी ट्रेन का बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था। फ्रंटियर मेल दो घंटे देरी से चल रही थी; कोई नई बात नहीं थी। अपर क्लास वेटिंग रूम में कुर्सियों पर लोग बैठे थे; कोई स्थान रिक्त नहीं था। लम्बे सोफे पर एक श्रीमान अपना अधिपत्य जमाये हुए थे––बेसुध, और आसपास में होने वाली हरकतों से अनभिज्ञ, खर्राटे भर रहे थे। पहले मन में आया कि उन्हें उठाऊँ और नैतिकता और शिष्टाचार पर भाषण दूँ। परन्तु फिर तरस आया, सोचा, “नींद बड़ी चीज़ है। किसी के सपनों में विघ्न डालना ठीक नहीं।” मन मारकर प्लेटफार्म पर एकांत में एक खाली बेंच ढूंढकर मैंने डेरा डाला था।

बेचैन था, परंतु मेरी परेशानी का कारण ट्रेन का लेट होना नहीं था, अपितु मेरी एड़ी का दर्द था। एक हफ़्ते पहले तेज़ हवा में, आगरा में प्रशिक्षण स्काई-डाइविंग के दौरान टखने में मोच आई थी। दर्द असह्य तो नहीं था, परन्तु रह-रह कर चिड़चिड़ाहट हो रही थी। आयोडेक्स और क्रेप बैंडिज से कोई लाभ नहीं हो रहा था; दबने से  टीस हो उठती थी। और, उफ़ गर्मी, शरीर के हर रोम छिद्र से पसीना बह रहा था। दर्द और गर्मी से अपना ध्यान हटाने के लिए मैं डॉमिनीक लापीएर की बहुचर्चित पुस्तक, “सिटी ऑफ़ जॉय” में डूबने की कोशिश कर रहा था। एक मक्खी मुझ वायु-योद्धा के धैर्य को चुनौती दे रही थी; मेरी कोशिश को निरन्तर विफल कर रही थी। वॉकमैन पर मेरा पसंदीदा संगीत भी कानों के पर्दों पर हथौड़ों के प्रहार जैसा लग रहा था।

मेरा हाल बुरा था।

ऐसे में, वह कब हवा में तैरते पंख की तरह उतरा और मुझ से कुछ दूर आकर बैठ गया, पता ही नहीं चला। नज़र थोड़ी घूमी, तो मेरा ध्यान बग़ल में होती उसकी हलचल ने आकर्षित किया।

जैसा कि मुझे बाद में पता चला, उसकी उम्र मात्र सोलह वर्ष थी। परन्तु चेहरा देख कर वह छब्बीस वर्ष का लग रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे कि असली उम्र और प्रतीत होने वाली उम्र के अंतर को उस ने कुछ ही महीनों में जी लिया था। उसका मांस-रहित शरीर एक कंकाल प्राय था। कमर में सुतली से बंधी, धूल में सनी उसकी ढीली-ढाली पतलून, और दो टूटे हुए बटन वाली कमीज पर लगे पैबंद उसकी आर्थिक स्थिति और निराश्रयता का ऐलान कर रहे थे। मेरी उड़ती दृष्टि उस पर रुकने की बिलकुल भी इच्छुक नहीं थी परन्तु उसकी धँसी हुई आँखों में एक चमक देख कर कुछ ठिठकी। एक तरफ उसकी स्पष्ट दुर्दशा और दूसरी ओर उसकी आँखों में छुपी ख़ुशी में एक अनोखा विरोधाभास था। आदतानुसार मैं व्यर्थ के असमंजस में पड़ गया था।

सलीम की संपत्ति

थोड़ी देर में उसने अपना लकड़ी का संदूक खोलकर एक छोटी सी जूता पालिश की दूकान सजा दी। फिर इशारे से मेरे जूते पालिश करने की अनुमति माँगने लगा। उसकी दुर्दशा पर तरस खाकर मैंने हाँमी भर दी, यद्यपि मेरे जूते साफ़ थे। मैं मन ही मन तय कर चुका था कि ‘उस गरीब’ को उसकी अपेक्षा से कुछ अधिक पैसे दूँगा।

सलीम नाम था उसका।

धीरे-धीरे और सफाई से उसने अपने सामने पालिश की डिबिया, रंगों की बोतलें, जूते की क्रीम, गंदे कपड़े और ब्रश आदि सजा दिए। फिर वह अपने काम में तल्लीन हो गया। एक मंजे हुए कलाकार की तरह, वह रुक रुक कर, मेरे जूतों के केनवास पर अपने ब्रश के असर को निहार रहा था।

मैंने अपनी किताब अलग रख दी क्योंकि अब मुझे सलीम के चेहरे पर छपी दुनिया की श्रेष्ठ किताबों की एक लाइब्रेरी जो मिल गयी थी। मेरी दिलचस्पी को देख कर वह चहचहाया, “सर, मुझे यकीन है कि आप एक फौजी हैं।” और फिर, मेरे उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना उसने बोलना जारी रखा, “केवल फौजियों के कपड़े और उनके जूते इतने साफ़ होते हैं।” मैंने अनुमान लगाया कि वह मुझ से एक अच्छी टिप पाने के लिए भूमिका बना रहा था। मुझे उस गरीब का व्यवहार पूरी तरह अपेक्षित लगा।

“सलीम, तुम्हारी सेहत को क्या हुआ? तुम इतने कमजोर लग रहे हो।” मैंने विषय बदलने का प्रयास किया।

“सर, हाल ही में लंबी बीमारी से उठा हूँ; तपेदिक से ग्रस्त था। पिछले कुछ दिनों में मैं नरक से गुजरा हूँ। लेकिन, भगवान की कृपा है, बीमारी के दौरान, मैंने केवल मांसपेशियों को खोया है, हड्डियां अभी भी सलामत हैं। कुछ ही दिनों में मांस आ जायेगा और मैं फिर से पूरी तरह से ठीक हो जाऊँगा।”

अनजाने में, उस लड़के ने एक वायु-योद्धा की पीड़ा सहने की क्षमता को चुनौती दे डाली थी। अचानक ही मेरे टखने का दर्द गायब हो गया।

“बहुत गरमी है।” मैंने पुनः विषय बदलने की कोशिश की।

“लेकिन सर, हम गरीब, बिना छत के रहने वालों के लिए यह गर्मी बारिश या सर्दी से बेहतर है …” उसके तर्क में दम था। अब मैं प्रचण्ड गर्मी सहन कर पा रहा था। इसके पश्चात वह बोलता चला गया और मैं मंत्रमुग्ध होकर सुनता रहा।

मैंने ही उसे उकसाया था।

बातों-बातों में कब आधा घंटा बीत गया, पता नहीं चला। सलीम ने पालिश कर के जूतों को मेरे समक्ष निरिक्षण के लिए रख दिया और मेरे मुँह की ओर देखने लगा। मैंने मुस्कुराते हुए चमकते हुए जूतों के जोड़े को स्वीकार किया। मेरा मन अब भी अपनी ही बनाई हुई पगडण्डी पर धीरे-धीरे घिसट रहा था, “गरीब, बेचारा, टिप… “

मैंने अपने बटुए में से एक 50 रुपये का नोट निकाला और सलीम की गंदी, पालिश से भरी हथेली पर रखते हुए कहा, बाकी पैसे रख लो।” मैंने सोचा कि मैंने सलीम पर बड़ा एहसान कर दिया था, वह बच्चा अधिक पैसे पाकर खुश हो रहा होगा।

मुझे तनिक एहसास नहीं था कि मेरी सोच कितनी गलत थी…

शायद भरी दोपहर में, खुले नीले आसमान में बिजली का चमकना मुझे उतना आश्चर्यचकित नहीं कर पाता जितना कि उसके जवाब ने किया, “सर,” उसने कहा, “कृपया मुझे पैसे न दें। अगर मैं फौजियों से एक पैसा भी स्वीकार करूँगा, तो मैं नरक में जाऊंगा। जो कारगिल और सियाचिन में हमारे लिए अपने जीवन का बलिदान देते हैं उनसे मैं पैसे कैसे ले सकता हूँ? मुझे नरक में नहीं जाना है।” उसने हाथ जोड़ लिए। मैं पानी-पानी हो चुका था।

बड़े आग्रह के बावजूद सलीम ने पारिश्रमिक स्वीकार नहीं किया। उऋण होने के अंतिम प्रयास के तहत मैंने अपना एक अतिप्रिय बिल्ला (बैज)––जो मुझे एक सफल सैन्य अभियान के बाद एक मित्र सेना के अधिकारी ने एक स्मारिका के रूप में दिया था––उसकी कमीज की जेब पर लगा दिया। उस नन्हे देश भक्त ने मुस्कुराते हुए अटेंशन में खड़े होकर, एक फौजी सलूट कर के, मेरे उस आभार को स्वीकार कर के मुझे अनुग्रहित किया।

जाने से पहले सलीम एक प्रश्न छोड़ गया था जिसका जवाब खोजते-खोजते मेरा जीवन गुजर गया है: “फ़ौज के प्रति उसकी अपेक्षाओं पर मैं कैसे खरा उतर सकूँगा?”

(नोट: तथ्यों पर आधारित यह कहानी मेरी अंग्रेजी में प्रकाशित कहानी “The Shoeshine Boy” का हिंदी रूपांतर है।  हिंदी में अनुवाद के लिए मैं अपनी प्यारी बहन, प्रोफेसर रीता जैन का आभारी हूँ। )

पढ़ाई का दबाव और एक पिता-पुत्र की समझ

वर्ष और दिनांक तो याद नहीं, लेकिन हाँ, वह अप्रैल की तपती दुपहरी थी। मैंने तीन व्यक्तियों को उस भीषण गर्मी में सुब्रतो पार्क में चलते देखा, तो कार में बिठा लिया। थोड़े संकोच के साथ उन्होंने लिफ़्ट को स्वीकारा था। कार में बैठते ही उन में से एक ने कहा, “धन्यवाद भाई साहब, मैं रवीन्द्र शर्मा हूँ, यह मेरा भाई, नवीन है; और यह मेरा बेटा अजय है (नाम परिवर्तित है)।”

“ मैं ग्रुप कैप्टन अशोक चोर्डिया हूँ…।” अपना परिचय देने के साथ ही मैंने उनसे उनके गन्तव्य की जानकारी माँगी।

“आप हमें किसी ऐसे बस स्टॉप पर उतार दें, जहॉं से हमें निज़ामुद्दीन स्टेशन की बस मिल सके; ट्रेन पकड़नी है।” वह बोला।

“स्टेशन मेरे रास्ते में ही है। मैं आप लोगों को वहीं छोड़ दूँगा।”

“ आपकी बड़ी कृपा होगी भाई साहब।”

एक लंबी चुप्पी…

वे तीनों यों गुमसुम थे मानो असमंजस में हों कि क्या बात करें? मेरा अनुभव है कि सीधे-सादे लोग अजनबियों के सामने, और विशेषकर वर्दीधारियों के सामने, मितभाषी और अंतर्मुखी हो जाया करते हैं। मुझे इनर रिंग रोड पर लंबी दूरी तय करनी थी, और इसमें आधे घंटे से अधिक समय लगना था। गाड़ी में चार लोगों का इतनी देर चुपचाप बैठे रहना सचमुच कष्टप्रद हो जाता, अतः मैंने ही पहल की–“आप लोग दिल्ली के रहने वाले तो नहीं लगते हैं?”

“जी हम लोग कोटा से आए हैं; अजय की काउंसलिंग के लिए…”

“अच्छा!? तो कैसी रही काउंसलिंग? अजय क्या करना चाहता है?”

“काउंसलिंग तो ठीक-ठाक रही… परन्तु, मैं इसके बोर्ड की परीक्षा के नतीजों से दुखी हूँ।” पिता ने संजीदगी से उद्गार व्यक्त किया।

“क्यों? क्या हुआ?”

“इसको 94% अंक मिले हैं। पढ़ने तो यह बैठता ही नहीं है। यदि यह लगकर पढ़ाई करता तो कहीं ज़्यादा अंक ला पाता। इंजीनियरिंग करना चाहता है। आप ही इसे समझाइए।”

पढाई! पढाई! पढाई!

मैं हैरान था। इतने अंक पाकर तो कोई भी लोगों की ईर्ष्या का पात्र बन सकता है, और एकपिता श्री हैं जो गमगीन हैं। और चाहते हैं कि एक अजनबी उनका मार्गदर्शन करे। मुझे वह लड़का अत्यंत ही मेधावी प्रतीत हुआ; भला मैं उसको क्या सलाह देता लेकिन मैं उसके पिता को भी निराश नहीं करना चाहता था। मैंने वार्तालाप जारी रखा। जल्दी ही मैं समझ गया कि लड़का अत्यंत प्रखर था और तथ्यों को तुरंत समझ लेता था। इसलिए उसका पढ़ाई-लिखाई संबंधी कार्य अन्य छात्रों की तुलना में जल्दी समाप्त हो जाता था। एक ही बात को दोहराने में वह बोर हो जाता था और इसी वजह से पिताजी की आलोचना क्या केंद्र बन गया था। गहराई से विचार करने के बाद उसे देने लायक एक सलाह मेरे मस्तिष्क में कौंधीं। मैंने उससे कहा कि यदि वह अलग-अलग पुस्तकों से पढ़ेगा तो, तथ्यों को गहराई से समझ सकेगा। अलग-अलग पुस्तकों के प्रश्न, तथा गणितीय सवाल हल करने में आनन्द आएगा व नींव भी मज़बूत होगी। इसके उपरांत बचे समय का उपयोग अभिव्यक्ति की क्षमता बढ़ाने के लिए किया जा सकता है। अभिव्यक्ति की सामर्थ्य व्यक्ति को बहुत ऊँचाई तक ले जा सकती है, भले ही वह किसी भी क्षेत्र से संबंधित हो। तीनों व्यक्ति मंत्रमुग्ध हो कर सुन रहे थे।

“अंकल मैं ऐसा ही करूँगा।”

“बहुत ख़ूब! बेटा, आप में और बहुत कुछ कर सकने की सामर्थ्य है। आपको इसका उपयोग अपने ज्ञान के आधार को मज़बूत बनाने में, और अभिव्यक्ति की क्षमता को बेहतर बनाने में करना चाहिए।”

उस वार्तालाप से पिताश्री गदगद थे। निज़ामुद्दीन स्टेशन पर उतरने के बाद उनको (पिताजी को) अलग ले जाकर मैंने सलाह दी कि बच्चे को पढ़ाई के मामले में स्वतन्त्र छोड़ दें। ऐसा करने से नतीजे कई गुना बेहतर होगें। मैंने उस प्रकरण को वहीं समाप्त समझ लिया था।

लेकिन नहीं…

एक माह बाद रवीन्द्र का फ़ोन आया। “भाई साहब आपने तो बच्चे पर जादू ही कर दिया। वह बिलकुल बदल गया है। इस परिवर्तन के लिए मैं आपका आभारी हूँ।”

“ये तो बड़ी अच्छी बात है। उम्मीद करता हूँ कि वह इसी तरह प्रगति करता रहेगा। उसे मेरा शुभाशीष कहिएगा।” उस दिन कुछ इसी तरह की बातें हुईं।

मेरी सोच के विपरीत यहाँ भी मामले की इतिश्री नहीं हुई।

कुछ महीनों बाद फिर से रवींद्र का फ़ोन आया। “भाई साहब, मुझे आपकी सलाह की अत्यंत आवश्यकता है। अजय एक साल ड्राप लेकर आई आई टी (IIT) की तैयारी करना चाहता है। यदि वह सफल न हुआ तो व्यर्थ ही साल बर्बाद हो जाएगा। हम क्या करें? रवींद्र की इस माँग से मैं उलझन में पड़ गया। उसके स्वर की बैचेनी बता रही थी कि वह बहुत चिंतित था। मैं कुछ पल सोचता रहा। वे पल युगों की तरह थे। मैं शिद्दत से महसूस कर रहा था कि, उसको मेरी सलाह पर बड़ा भरोसा था और इसी आशा से वह मुझ से सलाह माँग रहा था। उसकी माँग को ठुकराना मेरे वश में नहीं था। लेकिन मैं उसे क्या सलाह दे सकता था? कुछ पल हम लोग इधर उधर की बातें करते रहे। इस बीच मैंने अपने विचार संगठित किए। फिर मैं बोला, “रवींद्र यदि हम नियम से रहते हैं तो 75-80 वर्ष जी सकते हैं। एक वर्ष तो इस जीवन का छोटा सा अंश है। यह महत्त्वहीन है। यदि ड्रॉप लेने की अनुमति अजय को मिल जाएगी तो वह सफल होने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा देगा। और पूरी संभावना है कि वह सफल होगा। फिर हमें कितनी ख़ुशी होगी। और मान लो वह नहीं कर पाया तो उसे स्वयंकी क्षमता का अनुमान हो जाएगा। और एक साल में वह जो मेहनत करेगा, वह व्यर्थ नहीं जाएगी। वह उसकी कॉलेज की पढ़ाई में सहायक होगी ही। अंत में मैं तो यही कहूंगा कि उसे ब्रेक ले लेने दो, और परिणाम की चिंता किए बिना उसके साथ पूर्ण सहयोग करो। इससे वह पढ़ाई तो अच्छी करेगा ही–आपके और नज़दीक आ जाएगा; आपको और ज़्यादा प्यार करेगा और आपका अधिक आदर भी करेगा। मैं महसूस करता हूँ कि वह आपके हार्दिक सहयोग का अधिकारी है।”

रवीन्द्र ने मुझे हृदय से धन्यवाद दिया। अगले कुछ माह तक मैं उत्सुकता से रवींद्र के फ़ोन की प्रतीक्षा करता रहा, लेकिन व्यर्थ। समय बीतते मैं उन बातों को भूलने सा लगा था। तभी फिर एक दिन रवींद्र का फ़ोन आया। ”आप कैसे हैं? यहाँ पर सब कुशल-मंगल है। अजय अच्छा चल रहा है। जल्दी ही वह इंजीनियर बन जाएगा। मेरे साथ वह भी आपकी अमूल्य सलाह के लिए धन्यवाद देर हा है; प्रणाम कर रहा है।”

“बड़ा शुभ समाचार है। ब्रेक लिया था क्या? क्या उसे आई आई टी (IIT) में प्रवेश मिला?” मेरी उत्सुकता अदम्य थी।

“भाई साहब मैंने उसे स्वतंत्र छोड़ दिया था। उस से कहा कि ब्रेक लेकर मनोयोग से आई आई टी (IIT) प्रवेश परीक्षा की तैयारी करे। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। उसे अपनी पसंद का कॉलेज मिल गया और ब्रांच भी। मैं आपको उसकी प्रगति से अवगत कराता रहूगॉं।”

रवीन्द्र समय समय पर अपनी छोटी मोटी खुशियाँ मेरे साथ साझा करता रहता है।

(यह पोस्ट मेरे अंग्रेजी पोस्ट “Question of a Sabbatical” का हिंदी रूपान्तर है, जिसके लिए मैं अपनी प्रिय बहन प्रोफेसर रीता जैन का आभारी हूँ।)