मेरा भारत (वाकई) महान!

आजकल देश में बारहों महीने देश-भक्ति की लहर होती है। कोई न कोई  राजनीतिक दल या समुदाय किसी न किसी महान व्यक्ति को याद कर रहा होता है––कभी लोग गाँधी को, तो कभी भगत सिंह को; कभी नेहरू को तो कभी महाराणा प्रताप को याद करते हैं। कोई न मिले, तो लोग अपने श्रद्धा सुमन देश पर मर-मिटने वाले शहीद जवानों पर ही अर्पण कर देते हैं। देश-भक्ति के छोटे-बड़े हिलकोरों से भारत सदा मनमस्त रहता है। गणतन्त्र दिवस और स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर तो मानो देश-भक्ति की सुनामी ही आ जाती है।

राष्ट्रपर्वों पर राष्ट्रध्वज की शान निराली होती है। न जाने कहाँ-कहाँ से निकल कर तिरंगा हर हिलती-डुलती और चलती-फिरती वस्तु और वाहन पर शान से लहराता दिखाई देने लगता है। फिर झण्डा प्लास्टिक का हो, सिल्क का हो, या असली खादी का, कोई मायने नहीं रखता। देशवासियों की भावनाओं का ध्यान रखते हुए कुछ लोग कागज़-कपडे वाले मुद्दे को तूल नहीं देते, तो कुछ उस ‘तुच्छ’ मुद्दे को (फिलहाल) दरकिनार कर देते हैं। ऐसे समय तिरंगे की बिक्री शीर्ष पर होती है। और क्यों न हो, उसका एक-एक ताना-बाना देश प्रेम की भावना से जो रंगा होता है। लोग जो भी कहें, तिरंगा तिरंगा होता है, उसका भी अपना दिन होता है।

और फिर, ऐसे समय शब्द, सुर, ताल और लय कैसे भी हों––गली, नुक्कड़ और चौराहों पर लाउड-स्पीकरों पर देश-भक्ति से सराबोर गीत निर्जीव से निर्जीव व्यक्ति में प्राण फूँक देते हैं। इसी प्रकार, टीवी चैनलों पर देश-भक्ति से ओत-प्रोत सीरियलों और फिल्मों का अम्बार सा लग जाता है। एक प्रकार से देश-भक्तों में देश-भक्ति दर्शाने की होड़ सी लग जाती है।

देश भक्त फिल्म निर्माता और अभिनेता न केवल अपनी देश के युद्ध गौरव को दर्शाती बहुसितारा (मल्टीस्टारर) फिल्मों को इसी दौरान पर्दों उतरने की उधेड़बुन में रहते हैं, बल्कि सिद्धिविनायक मंदिर में माथा टेक कर उन फिल्मों की सफलता के लिए मन्नत भी मांगते हैं। भगवान फिल्म उद्योग की सुनता भी खूब है। देखिये न, लोग मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी को कम, सनी देओल को 1971 भारत-पाक युद्ध का नायक ज्यादा मानते हैं; मेरी कॉम से ज्यादा प्रियंका चोपड़ा को पहचानते हैं।

मेरा भारत (वास्तव में) महान है!

इन राष्ट्रीय पर्वों के बारे में मेरे बचपन की यादें सीदी-सादी हैं और आज, पचास साल बाद, भी बिलकुल स्पष्ट और ताजा हैं। क्यों न हों? बस्ते की झंझट नहीं, आधे दिन बाद स्कूल की छुट्टी हो जाती थी। ध्वजारोहण के बाद सब “वन्दे मातरं” गाते थे; प्रिंसिपल के भाषण के बाद देश भक्ति के कुछ गीत और नाटक होते थे। थोड़ी देर देश के वीर शहीदों के बारे में सोचते थे, उनसे प्रेरित होते थे। “भारत माता की जय” के नारे और वीर पुरुषों की गाथाएं बालमन को देश के प्रति उदात्त भावना से भर देती थीं। चाहे मोतीचूर के लड्डूओं के बँटते ही घर की तरफ गिल्ली-डंडा खेलने भागते थे, लेकिन भावना कुछ ऐसी होती थी कि कहीं भी, कभी भी, “जन गण मन….” की धुन कानों में पड़ती थी, तो सबकुछ छोड़ कर सीधे खड़े हो जाते थे। और फिर, पूरे वर्ष महारानी लक्ष्मीबाई, महाराणा प्रताप, शहीद भगत सिंह, चंद्र शेखर आजाद आदि की चर्चा होती थी। भावना कुछ ऐसी होती थी, जिसकी परिकल्पना सरलता से शब्दों में नहीं की जा सकती है।

मेरा भारत तब भी महान था!

फिर से वर्तमान में…

हाल ही में, मैं अपनी तीसरी पीढ़ी के एक बालक के साथ कार में सैर रहा था। बालक निश्चय ही मेधावी है। रास्ते में करीब साठ फुट ऊँचे खम्बे पर लहराता तिरंगा दिखाई दिया। झण्डा देख कर मेरा सीना गर्व से फूल गया। मैंने सम्मान से उसे निहारा और बालक से पूछा, “बेटा, जब आप अपना राष्ट्रीय ध्वज देखते हैं, तो आपके मन में कैसे विचार आते हैं?”

मेरा भारत महान!

उस अपेक्षापूर्ण प्रश्न के उत्तर की प्रतीक्षा करने में मुझे कोई ऐतराज नहीं था।

परन्तु…

परन्तु, बालक ने एक बार झंडे को और एक बार मुझे अर्थहीन दृष्टि से ताका। सच मानिये, उस छोटे से बालक ने मुझे, और (मेरे प्यारे) झंडे को “देखा नहीं”, उसने असल में हमें “ताका”। फिर वह तपाक से और भावहीनता से बोला, “नानाजी, वास्तव में, कुछ नहीं; तिरंगे को देख कर मेरे मन में कोई विचार नहीं आते हैं।”

मुझ पर मानो गाज गिर गयी। परन्तु मैं भी हार मानने वाला कहाँ था? भूतपूर्व वायु-योद्धा जो हूँ।

“क्या तिरंगा आपको देश के वीरों की और शहीदों की याद नहीं दिलाता है? इसे देख कर आप के मन में देश प्रेम की भावना जागृत नहीं होती है?” मैंने बच्चे से हर शब्द पर अत्यधिक जोर देकर पूछा। मेरी उम्मीदों का बांध और ऊँचा हो चुका था।

उस बालक के उत्तर ने मेरी उम्मीदों के बांध को तहस-नहस कर दिया और उसकी तबाही से आने वाले सैलाब में मैं बह गया, डूब गया। अवाक, निस्तब्ध… मैं उसे देखता ही रह गया। वह बड़ी सहजता से बोला, “नानाजी, मुझे इतना अधिक होमवर्क करना होता है कि मेरे पास देश और तिरंगे के विषय में सोचने का समय ही नहीं बच पता है।”

हतप्रभ, मैं उस नादान को पथराई आँखों से देखता ही रह गया।

भारी मन से मैंने कार आगे बढ़ा दी।

अभी थोड़ा ही चले थे कि एक विशाल विज्ञापन-पट (होर्डिंग) पर गाँधी जी की भव्य तस्वीर देखी। मेरे मन में देश-भक्ति का उबार एक बार फिर आया। आया और चला गया।  मेरी हिम्मत नहीं हुई कि नन्हे बालक से पूछ लूँ, “ये कौन हैं?” मन में आशंका थी कि कहीं बच्चा जवाब में यह न कह दे, “नानाजी, यह तो बेन किंग्सले है।”

निश्चित ही, मेरा भारत महान है। सदैव रहेगा।

देश प्रेम और देश भक्ति पर अभी और कहना बाकी है…

(यह पोस्ट मेरे अंग्रेजी पोस्ट “I Love My India” का हिंदी रूपान्तर है, जिसके लिए मैं अपनी प्रिय बहन प्रोफेसर रीता जैन का आभारी हूँ।)